सिर्फ ₹999 महीना। यही एक लाइन आपको जिंदगी भर गरीब रख सकती है। आज मैं आपको वो हिसाब दिखाऊंगा जो कोई सेल्समैन पूरी जिंदगी में कभी नहीं दिखाता।
दो दोस्त थे, एक का नाम था रवि और दूसरे का नाम था समीर। रवि हर महीने अपनी सैलरी का एक हिस्सा ईएमआई में देता है। समीर हर महीने उतनी ही रकम अपने आप को देता है। दोनों को लगता है कि उन्होंने समझदारी वाला फैसला लिया है।
दोनों गलत है क्योंकि एक ने अपने भविष्य को उधार पर बेच दिया और दूसरे ने अपने आज को इतना दबा दिया कि पता नहीं चला वह क्या मिस कर रहा है और जब आप 20 साल का हिसाब लगाएंगे तो फर्क आपकी नींद उड़ा देगा।
चलिए इसे बराबर से समझते हैं। रवि और समीर दोनों 26 साल के हैं। दोनों की सैलरी ₹45,000 महीना है। दोनों एक ही शहर में रहते हैं। एक जैसी नौकरी करते हैं। एक जैसे दोस्तों के ग्रुप में। फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों अपने पैसों के साथ क्या करते हैं।
रवि की सोच सीधी है। जिंदगी एक बार मिलती है। वो एक नया iPhone लेता है। ईएमआई पर ₹4,500 महीना 24 महीने के लिए। कुछ महीनों बाद एक बाइक अपग्रेड करता है। पुरानी बाइक बेचकर नई ले लेता है। ईएमआई ₹6000 महीना 36 महीने के लिए। फिर एक स्मार्ट टीवी ₹2500 महीना। फिर एक छुट्टी क्रेडिट कार्ड ईएमआई पर ₹3000 महीना। अब उसकी हर महीने की ईएमआई का टोटल लगभग ₹14,000 हो चुका है। उसकी सैलरी का करीब 31% बैंक और फाइनेंस कंपनियां इसे मैनेजेबल बताती हैं। क्योंकि 40% तक की ईएमआई इनकम रेशियो को सेफ माना जाता है।
लेकिन सेफ और स्मार्ट दो अलग चीजें हैं।
समीर की सोच अलग है। वह वही पुराना फोन इस्तेमाल करता रहता है। स्क्रीन पर एक क्रैक के साथ भी वह हर महीने ₹8,000 एक इंडेक्स फंड एज आईपी में डालता है। ऑटोमेटिक बिना सोचे। बाकी पैसा वह अपने खर्चों और छोटी-मोटी खुशियों में लगाता है। लेकिन कर्ज पर कुछ नहीं खरीदता।
उसके दोस्त उससे पूछते हैं भाई नया फोन कब लेगा? वो कहता है बाद में कोई इंप्रेस नहीं होता। दिन नंबर एक पर रवि के पास नया फोन है, नई बाइक है, Instagram पर स्टोरी है। समीर के पास एक एसआईपी कन्फर्मेशन ईमेल है। किसी पार्टी में कोई समीर से नहीं पूछता भाई यह कहां से लिया? रवि की तरफ हर कोई अटेंशन देता है। फीलिंग की बात करें तो कोई मुकाबला ही नहीं है।
लेकिन फीलिंग और मैथ दो अलग चीजें हैं।
पहले साल में रवि को अच्छा लगता है। हर चीज नई है। हर चीज चमक रही है। उसे लगता है ईएमआई कोई बड़ी बात नहीं। सिर्फ ₹14,000 महीना तो है। वह अपने दोस्तों को बताता है कि उसने बड़ी समझदारी से नो कॉस्ट ईएमआई पर सामान लिया है। समीर उसका एसआईपी साल भर में सिर्फ ₹96,000 से बढ़कर ₹14,000 हुआ है। कोई नोटिफिकेशन नहीं, कोई तारीफ नहीं। बस एक नंबर थोड़ा सा ऊपर गया।
अब असली हिसाब देखते हैं क्योंकि यहीं से कहानी बदलती है। नो कॉस्ट ईएमआई कभी सच में नो कॉस्ट नहीं होता। रिटेलर प्रोडक्ट की कीमत में पहले ही इंटरेस्ट जोड़ देता है और फिर उसे 0% ईएमआई कहकर बेचता है। एक ₹80,000 का फोन अगर आप उसे कैश में खरीदें शायद 74,000 से ₹76,000 में मिल जाए। असली एमआरपी पहले से बढ़ाया गया होता है ताकि ईएमआई का इंटरेस्ट उसमें छुपाया जा सके।
24 महीने ईएमआई पर प्रोसेसिंग फी और छुपे हुए चार्जेस जोड़े तो वही फोन आपको ₹90 हजार से 95,000 का पड़ता है। रवि की बाइक ईएमआई पर 13 से 14% का इफेक्टिव इंटरेस्ट रेट लग रहा है जो उसे पता ही नहीं क्योंकि डीलर ने सिर्फ मंथली किश्त बताई टोटल कॉस्ट नहीं और अगर वह एक भी ईएमआई मिस करता है। लेट फीस अलग, क्रेडिट स्कोर पर हिट अलग और कभी-कभी पूरा नो कॉस्ट डील खत्म होकर सामान्य इंटरेस्ट रेट लागू हो जाता है जो 20 से 24% तक हो सकता है।
तीसरे साल तक रवि की स्थिति साफ हो जाती है। उसने 3 साल में अलग-अलग चीजों पर लगभग ₹54,000 ईएमआई में चुकाए हैं। लेकिन असली प्रोडक्ट वैल्यू अगर वह कैश में खरीदता सिर्फ ₹3,80,000 के आसपास होती। यानी सिर्फ इंटरेस्ट और चार्जेस में उसने करीब ₹1,20,000 गमवा दिए।
उन चीजों पर जिनकी वैल्यू अब तक आधी से ज्यादा गिर चुकी है। फोन पुराना हो चुका है। बाइक की रिसेल वैल्यू घट चुकी है। टीवी की नई मॉडल आ चुकी है। ईएमआई खत्म भी नहीं हुई और चीज पहले ही डिप्रिशिएट हो चुकी है।
यह है असली ट्रैप। आप एक घटती हुई वैल्यू के लिए बढ़ता हुआ कर्ज चुका रहे होते हैं।
समीर का एसआईपी 3 साल में ₹2,88,000 के कंट्रीब्यूशन पर लगभग ₹3,25,000 हो चुका है। 12% के औसत रिटर्न पर कोई ग्लैमर नहीं, कोई स्टोरी नहीं। बस एक बढ़ता हुआ नंबर। अब यहां ईमानदार होना जरूरी है।
रवि की जिंदगी में भी कुछ सही है। नया फोन उसकी प्रोडक्टिविटी बढ़ा सकता है अगर वह फ्रीलांस काम के लिए बेहतर कैमरा या स्पीड चाहिए। बाइक उसे नौकरी तक तेज पहुंचा सकती है। टाइम बचा सकती है और टाइम की भी कीमत होती है। कर्ज हमेशा बुरा नहीं होता। एक बाइक जो आपकी कमाई बढ़ाने में मदद करे।
एक स्किल कोर्स जो ईएमआई पर लिया लेकिन सैलरी डबल कर दे। एक लैपटॉप जो आपको बेहतर नौकरी दिलाए यह अच्छा कर्ज कहलाता है क्योंकि यह आपकी इनकम जनरेटिंग कैपेसिटी बढ़ाता है। ईएमआई का असली खतरा तब शुरू होता है जब वो डिप्रिशिएटिंग एसेट्स यानी वो चीजें जिनकी वैल्यू समय के साथ गिरती है और जो आपकी कमाई नहीं बढ़ाती पर बार-बार बिना सोचे लिया जाए।
पांचवें साल तक रवि एक नए फेज में पहुंच चुका है। पुरानी ईएमआई खत्म हो चुकी है। लेकिन उसने नई चीजें ले ली है क्योंकि ईएमआई खत्म होते ही बजट फ्री हो गया वाली फीलिंग आती है और वह फिर कुछ नया उठा लेता है।
यही सबसे बड़ा साइकोलॉजिकल ट्रैप है।
ईएमआई कल्चर में आप कभी असल में कर्ज मुक्त नहीं होते। बस एक ईएमआई खत्म होकर दूसरी शुरू हो जाती है। दिमाग में सिर्फ मंथली नंबर रहता है। टोटल कर्ज कभी नहीं दिखता। 5 साल में रवि की सैलरी ₹45,000 से बढ़कर ₹62,000 हो चुकी है। लेकिन उसकी सेविंग्स लगभग ₹400 ही है। क्योंकि हर सैलरी ह के साथ उसकी ईएमआई भी बढ़ी है।
इसे लाइफस्टाइल इनफ्लेशन कहते हैं और यह उतनी ही खतरनाक है जितनी असली महंगाई।
समीर की सैलरी भी उतनी ही बढ़ी है। लेकिन उसने अपना एसआईपी ₹8,000 से बढ़ाकर ₹12,000 कर दिया है। हर सैलरी हाइप पर एसआईपी भी थोड़ा बढ़ाते हुए 5 साल में उसका कुल इन्वेस्टमेंट लगभग ₹6,50,000 हो चुका है। यहां पर कहानी अलग होनी शुरू होती है। कंपाउंडिंग शुरुआत में बोरिंग लगती है। लेकिन धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ती है। ठीक वैसे ही जैसे एक छोटी बर्फ की गेंद पहाड़ से लुढ़कते हुए बड़ी होती जाती है।
10वें साल तक समीर का पोर्टफोलियो अलग-अलग समय पर एसआईपी बढ़ाते हुए लगभग ₹18 लाख तक पहुंच चुका होता है। जबकि रवि जिसने 10 साल में हर साल कोई ना कोई नई ईएमआई ली। कभी फोन अपग्रेड, कभी बाइक की जगह कार का डाउन पेमेंट आईएमआई पर, कभी शादी का खर्च पर्सनल लोन से उसकी कुल नेट सेविंग्स सिर्फ ₹3 लाख से ₹3,500 के आसपास है।
दोनों की सैलरी लगभग बराबर बढ़ी लेकिन नेटवर्थ में फर्क छ गुना से ज्यादा है। अब सवाल उठता है रवि ने आखिर गलत क्या किया? उसने अपनी हर सैलरी ह को अफोर्ड कर सकता हूं। मैं बदल दिया ना कि इन्वेस्ट कर सकता हूं मैं। जैसे-जैसे कमाई बढ़ी, ईएमआई की क्षमता बढ़ी और बैंकों रिटेलर्स ने उसे यही सिखाया कि ज्यादा कमाना यानी ज्यादा उधार लेने की काबिलियत।
यह सिस्टम जानबूझकर ऐसा बनाया गया है।
क्रेडिट कार्ड कंपनियां, रिटेलर्स, फाइनेंस एप्स सब चाहते हैं कि आप ईएमआई में सोचे। कैश में नहीं क्योंकि ईएमआई में सोचने पर ₹80,000 का फोन सिर्फ ₹3500 महीना लगता है और दिमाग असली कीमत भूल जाता है। इसे बिहेवियरल इकोनॉमिक्स में पेमेंट डिक्लिंग कहते हैं। जब पेमेंट और चीज खरीदने का पल अलग-अलग हो जाए तो दर्द कम महसूस होता है और आप ज्यादा खर्च करते हैं।
यही वजह है कि बाय नाउ पे लेटर एप्स इतनी तेजी से बढ़ रही है। वह इसी साइकोलॉजी पर बनी है।
15वें साल तक समीर का पोर्टफोलियो मान लीजिए उसने एसआईपी को सैलरी के साथ-साथ बढ़ाया और औसतन 12% रिटर्न मिला। करीब ₹42 लाख से ₹48 लाख के बीच पहुंच चुका है। रवि जिसने अपनी जिंदगी ईएमआई टू ईएमआईजी है। उसके पास आज भी कोई बड़ी सेविंग्स नहीं बल्कि एक नई कार लोन चल रही है और क्रेडिट कार्ड का बकाया भी। उसकी सैलरी अब ₹85,000 है। फिर भी महीने के आखिर में हाथ खाली। लेकिन यहां भी पूरी तस्वीर ना दिखाना गलत होगा। समीर ने भी कुछ खोया।
उसने अपनी 20 की कई छोटी खुशियां टाल दी। कुछ ट्रिप्स नहीं की। कुछ अनुभव मिस किए जो पैसों से नहीं खरीदे जा सकते। कुछ दोस्तों के साथ यादें कम बनी क्योंकि वह हर आउटिंग में हिसाब लगाता रहा। पैसा बचाना और जिंदगी को पूरी तरह टालना यह दोनों अलग बातें हैं। असली समझदारी दोनों के बीच का बैलेंस है। कुछ ईएमआई ठीक है।
अगर वह आपकी इनकम या स्किल बढ़ाने में मदद करें और कुछ खर्च जरूरी है। अगर वह आपकी मेंटल हेल्थ और रिश्तों के लिए मायने रखते हैं।
सवाल ईएमआई लेने या ना लेने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या आप हर फैसला मंथली किश्त में सोच रहे हैं या असली कीमत और असली जरूरत में। एक तीसरा किरदार भी है इस कहानी में प्रिया वह ना रवि जैसी है ना समीर जैसी वह भी ईएमआई लेती है लेकिन सोच समझकर जब उसे एक अच्छा लैपटॉप चाहिए था अपनी फ्रीलांस डिज़ जॉब के लिए उसने ईएमआई पर लिया ₹3500 महीना 12 महीने लेकिन उस लैपटॉप ने उसकी कमाई ₹15000 महीना बढ़ा दी क्योंकि अब वह बड़े प्रोजेक्ट्स ले सकती थी यह ईएमआई उसके लिए निवेश थी खर्च नहीं साथ ही वह हर महीने अपनी सैलरी का 20% ऐसा एसआईपी में डालती रही।
प्रिया का उदाहरण दिखाता है कि ईएमआई खुद दुश्मन नहीं है। दुश्मन है बिना सोचे। हर छोटी चाहत को ईएमआई में बदल देना।
एक आसान टेस्ट है जो आप खुद पर लगा सकते हैं। अगली बार जब आप कुछ ईएमआई पर लेने की सोें तीन सवाल पूछिए। पहला क्या मैं यह चीज पूरी कीमत कैश में देकर भी खरीदूंगा।
दूसरा क्या यह चीज मेरी कमाई बढ़ाएगी या सिर्फ मेरी लाइफ स्टाइल? तीसरा अगर अगले महीने मेरी सैलरी ना मिले तो क्या मैं यह ईएमआई आराम से भर पाऊंगा? अगर तीनों जवाब नहीं की तरफ जाते हैं तो शायद असली दिक्कत ईएमआई की सुविधा नहीं बल्कि वो चीज है जो आप अफोर्ड ही नहीं कर सकते।
20वें साल तक हिसाब पूरी तरह साफ हो जाता है। समीर जिसने 20 साल तक अपनी एसआईपी को अनुशासन से बढ़ाया उसका पोर्टफोलियो 12% के औसत रिटर्न पर करीब 1.1 करोड़ से 1.3 करोड़ के बीच पहुंच चुका है। रवि जिसकी सैलरी अब ₹1200 महीना है। फिर भी हर महीने किसी ना किसी ईएमआई में उलझा हुआ है और उसकी कुल नेट सेविंग्स ₹15 लाख से ₹18 लाख से ज्यादा नहीं। दोनों ने बराबर कमाया।
फर्क सिर्फ इतना था कि पैसा पहले किसके पास रुका?
बैंक के पास या समीर के पोर्टफोलियो में? हर बार जब रवि ने ईएमआई भरी, उसने असल में बैंक के शेयरहोल्डर्स के लिए रिटर्न बनाया। हर बार जब समीर ने एसआईपी भरा, उसने अपने लिए रिटर्न बनाया। यही पूरा फर्क है।
कौन आपके पैसे पर कंपाउंडिंग का फायदा उठा रहा है आप या बैंक?
एक बार जरा गहराई में उतर कर ईएमआई का गणित समझ लेते हैं क्योंकि यही वो हिस्सा है जो बैंक कभी साफ-साफ नहीं दिखाता। मान लीजिए आपने ₹1 लाख का सामान 18% सालाना ब्याज पर 12 महीने की ईएमआई में लिया। महीने की ईएमआई बनती है लगभग ₹9168। 12 महीने में आप कुल ₹116 चुकाते हैं। यानी सिर्फ ₹16 ब्याज में गए जो ठीक-ठाक लगता है।
लेकिन असली खेल तब शुरू होता है जब आप एक साथ कई ईएमआई चला रहे हो। हर एक अलग इंटरेस्ट रेट पर और हर एक अलग टेन्योर पर। रवि के केस में चारप अलग-अलग ईएमआई मिलाकर उसका ब्लेंडेड इंटरेस्ट रेट करीब 16 से 17% बैठता है।
यानी वो हर साल अपनी कुल ईएमआई वैल्यू का लगभग छठा हिस्सा सिर्फ ब्याज में गमवा रहा है। और ध्यान दीजिए यह पैसा किसी एसेट में नहीं जा रहा जो बढ़े यह पैसा सीधा बैंक और एनबीएफसी के मुनाफे में जा रहा है। अब इसे दूसरी तरफ से देखिए अपॉर्चुनिटी कॉस्ट की नजर से। अगर रवि अपनी हर ईएमआई किश्त यानी वही ₹14,000 महीना इसके बजाय एक इंडेक्स फंड में डालता 12% के औसत रिटर्न पर तो सिर्फ 5 साल में वह रकम बढ़कर लगभग ₹11,500 हो जाती।
यह वह पैसा है जो उसने असल में नहीं गवाया। लेकिन जिसे बनाने का मौका उसने गमवा दिया। फाइनेंस में इसे अदृश्य नुकसान कहा जा सकता है। ऐसा नुकसान जो कभी बैंक स्टेटमेंट में लाल अक्षरों में नहीं दिखता क्योंकि हुआ ही नहीं सिर्फ मौका चूका गया।
क्रेडिट स्कोर की कहानी भी अलग नहीं है।
हर बार जब आप ईएमआई टू ईएमआई जिंदगी जीते हैं और अपनी क्रेडिट यूटिलाइजेशन 30 से 40% से ऊपर रखते हैं। आपका क्रेडिट स्कोर धीरे-धीरे कमजोर पड़ता है। 5 साल बाद जब आपको असल में एक बड़ा लोन चाहिए होता है। होम लोन जहां इंटरेस्ट रेट का 1% फर्क भी लाखों रुपयों का अंतर बना देता है। तब आपका खराब क्रेडिट स्कोर आपको ऊंची दर पर लोन दिलाता है।
यानी छोटी ईएमआई आदतें बड़े लोन पर भी आपकी कीमत बढ़ा देती है। मार्केटिंग इंडस्ट्री इस पूरे सिस्टम को और मजबूत बनाती है। हर सेल सीजन में दिवाली सेल बिग बिलियन डेज एंड ऑफ सीजन सेल सबसे बड़ा हुक होता है। नो कॉस्ट आईएमआई शुरू सिर्फ ₹999 से। यह लाइन जानबूझकर आपकी सोच को टोटल कीमत से हटाकर मंथली नंबर पर ले आती है।
रिसर्च बताती है कि जब लोग किसी चीज को ईएमआई में देखते हैं, वह असल कीमत से 20 से 30% ज्यादा खर्च करने को तैयार हो जाते हैं क्योंकि दिमाग को ₹999 महीना किसी बड़ी रकम जैसा महसूस ही नहीं होता। यहां असली सबक यह नहीं है कि कभी ईएमआई मत लो।
असली सबक यह है हर ईएमआई एक फैसला है कि आप अपनी भविष्य की कमाई को आज खर्च कर रहे हैं इंटरेस्ट के साथ। कभी-कभी यह सही फैसला होता है। घर, एजुकेशन, बिजनेस इक्विपमेंट वो चीजें जो आगे चलकर आपकी कमाई बढ़ाएं।
लेकिन जब हर छोटी खुशी, फोन, गैजेट, छुट्टी, ईएमआई पर टिकी हो, तब आप अपनी भविष्य की सैलरी को आज ही गिरवी रख रहे हैं और कभी उस सैलरी को अपने लिए काम करने का मौका ही नहीं मिलता। रवि और समीर दोनों ने एक ही दिन शुरुआत की। एक जैसी सैलरी के साथ दोनों को लगा उन्होंने समझदारी वाला फैसला लिया।
फर्क सिर्फ इतना था।
एक ने अपनी हर सैलरी ह को ज्यादा उधार लेने की काबिलियत समझा। दूसरे ने उसे ज्यादा इन्वेस्ट करने का मौका समझा। असली सवाल ईएमआई का नहीं है। असली सवाल यह है जब अगली बार आपकी सैलरी बढ़े, आप क्या सोचेंगे? अब मैं यह अफोर्ड कर सकता हूं या अब मैं इतना ज्यादा इन्वेस्ट कर सकता हूं? क्योंकि यही एक फैसला 20 साल में आपको रवि बनाता है या समीर। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी कहानी में कहीं भी ज्यादा कमाव वाला सबक नहीं है।
रवि और समीर दोनों की सैलरी 20 साल में लगभग बराबर बढ़ी। कोई प्रमोशन का फर्क नहीं, कोई साइड इनकम का फर्क नहीं। पूरा फर्क सिर्फ एक आदत का था जो हर महीने दोहराई गई। एक ने पैसे को घटती हुई चीजों की तरफ भेजा। दूसरे ने बढ़ते हुए एसेट्स की तरफ और यही सबसे राहत की बात भी है। इसका मतलब है कि आपको अपनी सैलरी दोगुनी करने का इंतजार नहीं करना। सिर्फ अपनी आज की आदत बदलनी है।
अगर आप अभी अपने फोन में ऐप खोल कर देखें कितनी ईएमआई चल रही हैं और उनका टोटल मंथली आउटगो कितना है वो नंबर आपको आपकी असली फाइनेंशियल पोजीशन बताएगा। सैलरी स्लिप से भी ज्यादा सच्चाई से और अगर वह नंबर आपकी सैलरी के 15 से 20% से ज्यादा है तो शायद वक्त आ गया है एक-एक करके उन्हें खत्म करने का नई शुरू करने से पहले।
हर मंथली किशस्त के पीछे एक छुपा हुआ हिसाब होता है जो लंबे समय में दिखता है। तुरंत नहीं। अगली बार जब कोई सेल्समैन कहे सिर्फ ₹999 महीना एक पल रुकिए। टोटल कीमत पूछिए और फिर तय कीजिए कि आप रवि बनना चाहते हैं या समीर।