क्या आपने कभी एक ही Idea को 50वीं बार अपने दिमाग में घुमाया है?
क्या आपने कभी रात को बिस्तर पर लेटकर एक ही आईडिया को 50वीं बार अपने दिमाग में घुमाया है? बिजनेस शुरू करना है, चैनल बनाना है, जॉब बदलनी है या बस सुबह जल्दी उठना है? सब कुछ प्लान है। बस शुरू नहीं हुआ और सुबह होते ही वही पुरानी रूटीन।
सच बताइए। पिछले एक साल में ऐसे कितने आइडियाज आपके दिमाग में आए और बिना कुछ किए गायब हो गए? अगर इसका जवाब बहुत सारे है तो आपकी समस्या आलस नहीं है। आपकी समस्या टैलेंट की कमी भी नहीं है। आपकी असली समस्या है ओवरथिंकिंग। यानी सोचने की वह आदत जो आपको तैयारी में इतना उलझा देती है कि शुरुआत का मौका ही हाथ से निकल जाता है।
दोस्तों, आज का यह वीडियो पीटर होलिंस की किताब थिंकलेस डू मोर पर है। इस किताब का पूरा सार एक लाइन में यह है कि जिंदगी सोचने से नहीं करने से बदलती है। और आज मैं आपको इस किताब के सात ऐसे आइडियाज बताने वाला हूं जो आपके करने का तरीका बदल सकते हैं और इनमें से पहला ही आईडिया आपको उल्टा लगेगा क्योंकि वह कहेगा कि बेहतर बनने के लिए पहले अपने स्टैंडर्ड्स नीचे कीजिए। और हां, वीडियो के आखिर में एक बोनस पॉइंट भी है। उसके बिना बाकी सब सिर्फ जानकारी रह जाएगा। इसीलिए वीडियो को अंत तक जरूर देखिए।
अब एक बात साफ कर दूं। सोचना बुरी चीज नहीं है। प्लानिंग भी जरूरी है। लेकिन जब सोचना ही आपका काम बन जाए तब वह तैयारी नहीं रहता। वह बहाना बन जाता है।
जरा गौर कीजिए। जब आप किसी काम को टालते हैं, तब आप खुद से क्या कहते हैं? अभी सही समय नहीं है। पहले थोड़ी और जानकारी जमा कर लूं। पहले सब कुछ परफेक्ट प्लान कर लूं। ये बातें समझदारी जैसी सुनाई देती हैं। लेकिन असल में ये डर के कपड़े पहने हुए बहाने हैं।
जरा सोचिए, दो लोग हैं। दोनों को एक ही दिन एक बिजनेस आईडिया आया। पहला अगले 6 महीने तक रिसर्च करता रहा, वीडियो देखता रहा, नोट्स बनाता रहा। दूसरे ने पहले ही हफ्ते में एक छोटा, अधूरा, बेढंगा सा वर्जन बाजार में उतार दिया।
6 महीने बाद पहले के पास शानदार प्लान था और दूसरे के पास असली ग्राहकों की असली राय। अब बताइए किसके पास ज्यादा सीख है? यही वह फर्क है जिसे यह किताब एक्शन बायस के रूप में सामने रखती है। यानी सोचने के बजाय पहले करने की आदत।
1. अपने स्टैंडर्ड्स नीचे कीजिए, वरना आप कभी शुरू ही नहीं कर पाएंगे
यह सुनकर अजीब लगता है ना? लेकिन किताब के शुरुआती प्रमुख विचारों में से एक यही है। ज्यादातर लोग इसीलिए नहीं रुकते कि उन्हें काम नहीं आता। वे इसलिए रुकते हैं कि उन्हें पहली बार में ही परफेक्ट करना है। और जब मंजिल परफेक्ट हो तो पहला कदम डरावना लगने लगता है।
किताब का सुझाव है कि यह सोच अपनाइए कि जो काम करने लायक है, वह शुरुआत में खराब तरीके से करने लायक भी है। अमेच्योर बनना मंजूर कीजिए। पहला वीडियो खराब होगा। पहला बिजनेस प्लान कमजोर होगा। पहली बार जिम में आप ठीक से एक्सरसाइज भी नहीं कर पाएंगे। लेकिन खराब शुरुआत और शुरुआत ना करने में जमीन-आसमान का फर्क है।
खराब शुरुआत को सुधारा जा सकता है। जो शुरू ही नहीं हुआ उसे सुधारेंगे कैसे?
एक बात और, परफेक्शन अक्सर ऊंचे मापदंड जैसा दिखता है लेकिन असल में वह टालने का सबसे इज्जतदार तरीका है। क्योंकि जब तक काम शुरू नहीं होता तब तक वह फेल भी नहीं हो सकता। और यही सुरक्षा हमें सबसे महंगी पड़ती है।
आज का छोटा एक्शन: जो काम आप महीनों से टाल रहे हैं उसका सबसे बदसूरत, सबसे छोटा वर्जन आज बना डालिए, सिर्फ 20 मिनट के लिए।
2. मोटिवेशन का इंतजार मत कीजिए क्योंकि मोटिवेशन अक्सर शुरू करने के बाद आता है
हम सब मानते हैं कि पहले मन बनेगा, फिर काम होगा। लेकिन किताब का कहना है कि अक्सर उल्टा होता है। पहले एक छोटा सा एक्शन होता है और उसके बाद मन खुद बनने लगता है।
सोचिए, जिस दिन आपका बिल्कुल मन नहीं है, उस दिन भी अगर आप सिर्फ 5 मिनट के लिए टहलने निकल जाएं तो काफी संभावना है कि 5 मिनट बाद आप रुकना ही ना चाहें। वजह सीधी है। शुरू करना सबसे भारी हिस्सा होता है।
यह ठीक वैसा ही है जैसे सर्दी की सुबह रजाई से निकलना। पहले 10 सेकंड सबसे मुश्किल होते हैं, उसके बाद सब सामान्य लगने लगता है।
जो लोग हर सुबह अपना मूड देखकर तय करते हैं कि आज काम करना है या नहीं, वे अपनी पूरी जिंदगी की बागडोर अपने मूड को थमा देते हैं। और मूड एक ऐसा बॉस है जो कभी वक्त पर नहीं आता। इसीलिए किताब का जोर इस पर है कि एक्शन मोटिवेशन का नतीजा नहीं, उसकी वजह है।
आज का छोटा एक्शन: जिस काम से आप बच रहे हैं उसे सिर्फ 5 मिनट दीजिए। बस 5 मिनट। उसके बाद चाहे तो रुक जाइए।
3. अपने दिमाग की दलीलों पर सिर्फ दो शब्दों में जवाब दीजिए – तो क्या?
किताब बताती है कि आपका दिमाग काम टालने के लिए हजार कारण ढूंढ लेता है। मैं बहुत थका हुआ हूं। यह महंगा है। मेरे पास टाइम नहीं है। मुझे पक्का नहीं पता कि मैं यह करना भी चाहता हूं या नहीं।
इन दलीलों में से कुछ सच भी होती हैं। और यही इन्हें खतरनाक बनाता है। लेकिन जब आप किसी काम के लिए सच में प्रतिबद्ध होते हैं तब ये दलीलें फैसला नहीं बदल सकतीं। थकान है तो क्या? डर लग रहा है तो क्या? आज मूड नहीं है तो क्या?
मैं यह नहीं कह रहा कि आप अपनी सेहत या हालात को नजरअंदाज करें। मैं यह कह रहा हूं कि हर बहाने को अपना ड्राइवर मत बनाइए।
सोचिए, अगर आप किसी दोस्त से कहें कि मैं सुबह 6:00 बजे आऊंगा तो क्या आप सुबह उसके दरवाजे पर अपनी नींद का बहाना सुनाते हैं? तो अपने आप से किए गए वादे के लिए दोहरा पैमाना क्यों?
आज का छोटा एक्शन: अगली बार जब दिमाग कोई बहाना दे तो उसे कागज पर लिखिए और उसके सामने बड़े अक्षरों में लिखिए – तो क्या?
अब तक हमने तीन आइडियाज देखे जो आपको शुरू करने में मदद करते हैं। आगे के चार आइडियाज आपको शुरू करने के बाद चलते रहना सिखाएंगे।
4. सिर्फ क्या करना है की लिस्ट मत बनाइए, क्या नहीं करना है की लिस्ट भी बनाइए
ज्यादातर लोग ओवरथिंक इसलिए करते हैं क्योंकि उनके सामने चुनने के लिए बहुत कुछ होता है। 100 आइडियाज, 20 लक्ष्य, 10 प्रोजेक्ट और जब सब कुछ जरूरी लगता है तब कुछ भी शुरू नहीं होता।
किताब में प्रायोरिटी तय करने के जो तरीके बताए गए हैं, उनमें वारेन बफेट से जोड़ा गया 5/25 नियम भी है। इसमें आप अपने 25 लक्ष्य लिखते हैं। फिर उनमें से सिर्फ पांच सबसे जरूरी चुनते हैं और बाकी 20 से तब तक दूरी बनाकर रखते हैं जब तक पहले पांच पूरे नहीं हो जाते।
क्योंकि असली खतरा बुरे विकल्प नहीं, अच्छे विकल्प होते हैं। वे आपका ध्यान बांटकर आपको हर जगह थोड़ा-थोड़ा और कहीं भी पूरा नहीं होने देते। जरा सोचिए, एक इंसान जो पांच काम अधूरे छोड़ता है और एक जो एक काम पूरा करके अगला उठाता है, इनमें से किसकी जिंदगी आगे बढ़ी होगी?
आज का छोटा एक्शन: अपने सारे अधूरे प्लांस एक पेज पर लिखिए। उनमें से सिर्फ तीन पर गोला लगाइए और बाकी को फिलहाल किनारे रख दीजिए।
5. हर फैसले के लिए सोचने की एक डेडलाइन तय कीजिए
ओवरथिंकिंग का सबसे बड़ा कारण यह है कि सोचने की कोई सीमा ही तय नहीं होती। आप एक फोन चुनने में 3 हफ्ते लगा देते हैं और कैरियर जैसे बड़े फैसले पर 3 साल बिता देते हैं। किताब फैसलों को एक ढांचा देने पर जोर देती है ताकि दिमाग बार-बार उसी सवाल पर ना घूमता रहे।
एक प्रैक्टिकल फ्रेमवर्क के तौर पर आप छोटे फैसले के लिए 10 मिनट, मध्यम फैसले के लिए एक दिन और बड़े फैसले के लिए एक हफ्ता रख सकते हैं। और डेडलाइन खत्म होते ही जो सबसे अच्छा विकल्प दिख रहा है, उसे चुन लीजिए। वह 100% सही ना निकले। लेकिन याद रखिए, एक ठीक-ठाक फैसला जो आज लिया गया उस परफेक्ट फैसले से कहीं बेहतर है जो कभी लिया ही नहीं गया।
ज्यादा जानकारी हमेशा ज्यादा साफ तस्वीर नहीं देती। कई बार वह सिर्फ ज्यादा धुंध पैदा करती है।
आज का छोटा एक्शन: जो फैसला आप हफ्तों से टाल रहे हैं, उसके लिए आज एक तारीख तय कीजिए और उसी तारीख को उसे बंद कर दीजिए।
6. अपने सबसे मुश्किल काम को अपनी सबसे तेज एनर्जी के वक्त पर रखिए
हम सब मानकर चलते हैं कि हमारी एनर्जी पूरे दिन एक जैसी रहती है। लेकिन ऐसा है नहीं।
किताब अल्ट्रेडियन रिदम की बात करती है। यानी हमारे शरीर और दिमाग की ऊर्जा का उतार-चढ़ाव जो पूरे दिन लहरों की तरह चलता रहता है। कभी दिमाग तेज दौड़ता है और कभी बिल्कुल सुस्त पड़ जाता है।
अब सोचिए, अगर आप अपना सबसे जरूरी काम उस समय करने बैठे जब दिमाग थका हुआ है तो वह काम भारी लगेगा और आपको लगेगा कि आप में ही कुछ कमी है। जबकि कमी आप में नहीं, आपके टाइम टेबल में है।
कुछ लोगों का दिमाग सुबह सबसे तेज चलता है। कुछ का रात में। कुछ दिनों तक ध्यान दीजिए कि आपकी एनर्जी कब ऊपर जाती है और कब नीचे। फिर सबसे मुश्किल और सबसे जरूरी काम ऊपर वाले वक्त में रखिए और ईमेल, मैसेज जैसे हल्के काम नीचे वाले वक्त में।
मान लीजिए आप किसी बिजनेस पर काम कर रहे हैं तो पैसे के हिसाब-किताब और नए क्लाइंट्स की कॉल जैसे काम, जो सबसे ज्यादा दिमाग मांगते हैं, उन्हें तेज वक्त में रखिए।
इससे आपको कोई नई मेहनत नहीं करनी पड़ती। बस वही मेहनत सही जगह लगानी पड़ती है।
आज का छोटा एक्शन: आज तीन बार अपनी एनर्जी को एक से 10 के बीच नंबर दीजिए और नोट कीजिए।
7. डर को खत्म करने का इंतजार मत कीजिए, उसे साथ लेकर छोटे-छोटे रिस्क लेना शुरू कीजिए
ज्यादातर ओवरथिंकिंग के पीछे असली वजह डर होती है। लोग क्या कहेंगे? अगर फेल हो गया तो? अगर पैसा डूब गया तो? और दिमाग इन सवालों के जवाब ढूंढने में महीनों निकाल देता है।
जबकि उन सवालों का असली जवाब सिर्फ करके देखने से मिलता है। किताब रिस्क को खतरा नहीं, सीखने का मौका मानने की बात करती है। इसका मतलब यह नहीं कि आप अपनी सारी जमा पूंजी दांव पर लगा दें। इसका मतलब है छोटे रिस्क।
अपना आईडिया एक दोस्त को सुनाइए। एक छोटा सा प्रोडक्ट 10 लोगों को बेच कर देखिए। एक कोर्स का पहला मॉड्यूल पूरा कीजिए।
ऐसे रिस्क में नुकसान छोटा होता है लेकिन सीख बड़ी मिलती है। और हर छोटे रिस्क के बाद आपका डर थोड़ा कम होता जाता है क्योंकि आपका दिमाग देख लेता है कि दुनिया खत्म नहीं हुई।
जब पैसे की बात आती है तब तो यह और भी जरूरी है। कोई भी नया बिजनेस या निवेश शुरू करने से पहले छोटी रकम से टेस्ट कीजिए। इससे आप बिना बड़े नुकसान के सीखते हैं।
आज का छोटा एक्शन: कोई एक ऐसा छोटा रिस्क चुनिए जिससे आप बच रहे थे और उसे इसी हफ्ते कर डालिए।
इन सातों Ideas का असली मतलब
इन सबके पीछे एक ही सोच है। सोचना तैयारी के लिए है, बचने के लिए नहीं।
तो दोस्तों, ये थे सात आइडियाज। अपने स्टैंडर्ड्स नीचे कीजिए। मोटिवेशन का इंतजार मत कीजिए। बहानों को “तो क्या?” कहकर पीछे छोड़िए। प्रायोरिटी की लिस्ट छोटी रखिए। फैसलों की डेडलाइन तय कीजिए। एनर्जी के हिसाब से काम बांटिए और डर के साथ छोटे रिस्क लेना शुरू कीजिए।
BONUS – अगले 24 घंटे में सिर्फ एक Idea पर Action लीजिए
अब वो बोनस पॉइंट जिसका मैंने वादा किया था। यह बहुत सीधा है, लेकिन सबसे कम लोग इसे करते हैं। इन सातों आइडियाज में से सिर्फ एक चुनिए। सातों नहीं, सिर्फ एक। और उसे अगले 24 घंटे के अंदर कर डालिए।
वजह साफ है। किसी अच्छी बात को सुनने के बाद हम जितना इंतजार करते हैं, उसे करने की संभावना उतनी ही घटती जाती है।
इसलिए अभी एक कागज उठाइए और लिखिए कि कौन सा आईडिया आप आजमाएंगे, कल किस वक्त, कहां और कितने मिनट के लिए। और अगर हो सके तो किसी एक इंसान को बता दीजिए कि आप यह करने वाले हैं। क्योंकि जानकारी तब तक सिर्फ जानकारी रहती है जब तक उस पर एक्शन ना लिया जाए।
शुरुआत को अपनी आदत बनाइए
अब वापस उसी सवाल पर आते हैं जहां से हमने शुरुआत की थी।
पिछले साल आपके दिमाग में जो आइडियाज आए और गायब हो गए, उनमें से कुछ शायद आज भी आपके अंदर जिंदा हैं। बस उन्हें एक छोटे से एक्शन की जरूरत है।
सोचिए, आज से 5 साल बाद आप पलट कर देखेंगे तो आपको यह याद नहीं रहेगा कि आपने कितनी बार किसी काम के बारे में सोचा था। आपको सिर्फ वही याद रहेगा जो आपने किया था। और जो नहीं किया, वह हमेशा एक काश बनकर रह जाएगा।
इसलिए तैयारी को अपनी आदत मत बनाइए। शुरुआत को बनाइए। जिंदगी उनकी नहीं बदलती जो सबसे ज्यादा सोचते हैं। जिंदगी उनकी बदलती है जो सोचने के बाद उठकर पहला कदम रख देते हैं।